Ajay:- शहर के कोयला व्यापारिक गलियारों में इन दिनों एक ‘फुकट्या’ पदाधिकारी के कथित रौब की खूब चर्चा हो रही है! चर्चा है कि कोयला व्यापारियों पर मशीन के नाम पर दबाव बनाने और अपना प्रभाव दिखाने की कोशिश की जा रही है। गाड़ी पर पद की बड़ी पट्टी और व्यवहार में कथित चिल्लर अंदाज देखकर लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर पद मिला है तो क्या खुद को सर्वेसर्वा समझ लिया जाए? पद जनता की सेवा और जिम्मेदारी निभाने के लिए होता है या व्यापारियों पर धौंस जमाने के लिए? व्यापार करना है या पहले पदाधिकारी के मिजाज का हिसाब लगाना है.ऐसे सवाल अब व्यापारिक हलकों में चर्चा का विषय बने हुए हैं।
मशीन का मामला हो या बात मनमुताबिक न बनने की स्थिति सीधे पुलिस को फोन करने की भी चर्चा.बताया जा रहा है कि, संबंधित पदाधिकारी द्वारा शिकायत करने और पुलिस को मौके पर बुलाने का रास्ता अपनाया जाता है। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। सवाल यह है कि यदि किसी व्यापारी से वास्तविक गलती होती है, तो नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए; लेकिन यदि शिकायतों का इस्तेमाल दबाव बनाने के लिए किया जा रहा हो, तो उसकी भी निष्पक्ष जांच जरूरी है। आखिर हर विवाद में पुलिस को बुलाना ही अपने प्रभाव का प्रदर्शन है क्या? संबंधित पदाधिकारी की भूमिका और मशीन के इस्तेमाल से जुड़े नियमों की वास्तविकता सामने आना जरूरी है।
गाड़ी पर ‘फुकट्या’ पद का सिक्का बड़ा, तो क्या कानून और नियमों से भी बड़ा हो गया कोई? शहर में उठ रही चर्चाओं के बीच अब यही सवाल पूछा जा रहा है कि यह पद की जिम्मेदारी है या केवल रौब दिखाने का अंदाज! कोयला व्यापारियों के साथ विवाद की असल वजह सिर्फ मशीन है क्या, पुलिस को बुलाने की नौबत क्यों आती है और संबंधित पदाधिकारी की इस पूरे मामले में क्या भूमिका है.इन सभी पहलुओं पर स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए। संबंधित पदाधिकारी का पक्ष सामने आना भी जरूरी है। क्योंकि पद की प्रतिष्ठा गाड़ी पर लगे बोर्ड से नहीं, बल्कि व्यवहार और जिम्मेदारी से बनती है। अब देखना यह है कि ‘पद का सिक्का’ चलता है या नियमों का!

