Ajay Kandewar,Wani : तालुका के बेलोरा रेत घाट को लेकर इस समय बड़े सवाल खड़े हो गए हैं। यहां जो रेत का काम चल रहा है, वह कानूनी है या गैरकानूनी – यह समझना आम आदमी के लिए भी मुश्किल हो गया है। घाट पर बड़ी-बड़ी पोकलेन मशीनें दिन-रात काम कर रही हैं। नियमों के अनुसार रेत उत्खनन सिर्फ सूरज उगने से सूरज डूबने तक ही होना चाहिए, लेकिन यहां तो रात के अंधेरे में भी धड़ल्ले से रेत निकाली जा रही है। न समय की पाबंदी दिखती है, न कोई जांच।
रेत का डिपो बनाने के लिए जमीन का एन.ए. (नॉन एग्रीकल्चर) होना जरूरी है। लेकिन आरोप है कि बेलोरा घाट की रेत सीधे वेकोली प्रशासन की जमीन पर जमा की जा रही है। यह पूरी तरह नियमों के खिलाफ है। फिर भी प्रशासन कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं कर रहा, यह सवाल जनता पूछ रही है।परमिट का मामला भी उतना ही गंभीर है। यहां काम करने वाले मजदूरों, ट्रक चालकों और ठेकेदारों के पास सही परमिट हैं या नहीं, इसकी न तो ऑनलाइन जांच हो रही है और न ही मौके पर। तलाठी, मंडल अधिकारी और संबंधित विभागों की जिम्मेदारी होने के बावजूद सब कुछ “चलने दो” की नीति पर चलता दिख रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि “परमिट किस जगह का है और रेत कहां से आ रही है?”वणी का परमिट है या किसी और जिले का – जैसे यवतमाल या नाशिक – इसकी साफ जानकारी प्रशासन को लेनी चाहिए थी। लेकिन इस मुद्दे पर जानबूझकर आंखें बंद की जा रही हैं, ऐसा आरोप सामने आ रहा है।इन सब बातों से यह चर्चा तेज हो गई है कि बेलोरा घाट पर रेत तस्करी का मजबूत नेटवर्क काम कर रहा है। कुछ चुनिंदा लोगों को प्रशासन का पूरा संरक्षण मिलने की बातें भी खुलेआम हो रही हैं। खास तौर पर ‘सचिन’ नाम के व्यक्ति पर प्रशासन की खास मेहरबानी होने की चर्चा हर जगह है।आज बेलोरा घाट की हालत देखकर एक ही डायलॉग याद आता है –“गोलमाल है भाई… सब गोलमाल है!”अब देखना यह है कि प्रशासन कानून के मुताबिक सख्त कार्रवाई करेगा या फिर रेत माफियाओं के आगे एक बार फिर झुक जाएगा। बेलोरा घाट का यह मामला बड़ी कार्रवाई तक पहुंचेगा या हमेशा की तरह फाइलों में दब जाएगा – इस पर पूरे जिले की नजर टिकी हुई है।

