Ajay Kandewar : निर्भीक पत्रकार मृतक रवि ढुमणे की आत्महत्या को कई दिन बीत चुके हैं। रविवार को उनकी चौदहवीं है। परिवार शोक में डूबा है, लेकिन उससे भी ज़्यादा पीड़ा इस बात की है कि न्याय आज भी दरवाज़े के बाहर खड़ा है। जिन पर गंभीर आरोप हैं, वह “फ्रॉड विक्की सेठ” आज भी ताशे रोड पर बेखौफ घूमता हुआ दिखाई देता है।
पत्रकार मृतक रवि ढुमणे सिर्फ एक नाम नहीं थे। वे सत्य के लिए लड़ने वाले, अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले और डर से समझौता न करने वाले पत्रकार थे। ऐसे पत्रकार का अंत आत्महत्या में होना और फिर भी आरोपियों पर कार्रवाई न होना—यह पूरी व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल है।
चौदहवीं की तैयारी के बीच भी परिजनों की आंखें नम हैं और मन में एक ही सवाल जल रहा है—“हमने अपना बाप खो दिया, लेकिन क्या हमें न्याय मिलेगा?”परिवार का साफ़ कहना है कि विक्की सेठ पर अपराध दर्ज हुए बिना उन्हें शांति नहीं मिलेगी। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मानसिक उत्पीड़न जैसे गंभीर आरोप, और आत्महत्या जैसा संवेदनशील मामला सामने होने के बावजूद कार्रवाई में देरी हो रही है। यह देरी क्यों?
क्या यह लापरवाही है, या फिर किसी का दबाव?
यह सवाल अब सिर्फ परिवार तक सीमित नहीं रहा। शहर का आम नागरिक भी यही पूछ रहा है।चर्चा है कि विक्की सेठ के नाम पर कई फर्जीवाड़े हैं—कुछ मामले दबा दिए गए, कुछ अब सामने आने वाले हैं।अगर यह सब सच है, तो अब तक कार्रवाई क्यों नहीं?और अगर कुछ भी नहीं है, तो जांच से डर किस बात का?पत्रकार रवि ढुमणे की चौदहवीं सिर्फ एक धार्मिक कर्मकांड नहीं है—यह एक चेतावनी है, एक प्रश्नचिह्न है।आज अगर एक पत्रकार को न्याय नहीं मिला, तो कल सामान्य नागरिक का क्या होगा?अगर सच बोलने की कीमत आत्महत्या है, तो समाज किस दिशा में जा रहा है?भावुक परिजन कहते हैं—“हमारा भाई वापस नहीं आएगा, लेकिन उसके मौत के जिम्मेदारों पर कार्रवाई ज़रूर होनी चाहिए।वरना यह सिर्फ हमारी नहीं, पूरे समाज की हार होगी।”कल चौदहवीं है… लेकिन न्याय की प्रतीक्षा आज भी जारी है।और जब तक विक्की सेठ पर अपराध दर्ज नहीं होता,तब तक यह सवाल सोने वाला नहीं—और उस “विक्की सेठ”को भी चैन की नींद नहीं आएगी।

