Saturday, May 2, 2026
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राष्ट्र दिवस की रात ‘देशभक्ति’ नहीं, रेत माफिया की बेलोरा घाट में जीत?

Ajay Kandewar,Wani:- 26 जनवरी की रात वणी तहसिल शिरपूर पूलीस  थाना के अंतर्गत बेलोरा घाट में अंधेरे की आड़ में बड़े पैमाने पर गैरकानुनी स्वरूप में रेत पोकलेन से निकाली गयी। रात के समय घाट पर हलचल, मशीनों की आवाज और रेत से भरे वाहनों की आवाजाही की चर्चा स्थानीय लोगों में है। हालांकि प्रत्यक्ष कार्रवाई कहीं दिखाई नहीं दी, लेकिन संकेत साफ तौर पर बड़े खेल की ओर इशारा कर रहे हैं।

इन संकेतों के बावजूद तहसील प्रशासन की चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है। तहसीलदार और मंडल अधिकारी की जिम्मेदारी होते हुए भी कोई ठोस कदम न उठाया जाना संदेह को और गहरा कर रहा है। नागरिकों का कहना है कि जब रात में गतिविधियां साफ नजर आ रही थीं, तो प्रशासन को यह सब कैसे नहीं दिखा?बताया जा रहा है कि इस संभावित अवैध खुदाई से शासन को करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान हो सकता है। नियमों के अनुसार रॉयल्टी और अनुमति के बिना उपसा सीधे सरकारी खजाने पर डाका है। अगर समय रहते रोक नहीं लगी, तो यह नुकसान और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

अब इलाके में ‘चिरीमिरी’ और अंदरूनी मिलीभगत की चर्चा भी जोर पकड़ने लगी है। 26 जनवरी की रात का अंधेरा सिर्फ बेलोरा घाट तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रशासन की भूमिका पर भी सवालिया साया डाल गया है। जनता की मांग है कि इन संकेतों के आधार पर तत्काल जांच हो और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए।

तहसील प्रशासन का ‘सम्मान’ या दबाव? सचिन के आगे क्यों झुका तंत्र….

बेलोरा घाट में पोकलेन से रेत खुदाई को लेकर यह सवाल खुलकर उठ रहा है कि ‘सचिन’ का तहसील प्रशासन में इतना प्रभाव कैसे बन गया?स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि जहां कार्रवाई होनी चाहिए थी, वहां प्रशासन चुप बैठा रहा—मानो निगरानी नहीं, नाच-तमाशा चल रहा हो।

 

व्यवस्था की रक्षा के लिए जिम्मेदार हैं वही नियम तोड़ने लगें,….

अगर राज्य के महसूल मंत्री चंद्रशेखर बावनकुळे द्वारा दिए गए निर्देश ही महसूल विभाग नहीं मानता, तो फिर सवाल सीधा है—नियम आखिर किसके लिए बनाए जाते हैं?जब मंत्री के आदेशों को ही नजरअंदाज किया जाए, तो यह साफ संकेत है कि कहीं न कहीं प्रशासनिक ढिलाई या मिलीभगत है। और जब कुंपण ही खेत खाने लगे, यानी जो व्यवस्था की रक्षा के लिए जिम्मेदार हैं वही नियम तोड़ने लगें, तो नियमों का अस्तित्व सिर्फ कागज़ों तक सिमट कर रह जाता है।ऐसी स्थिति में:जनता का कानून से भरोसा उठता है.अवैध गतिविधियों को खुला संरक्षण मिलता है,जवाबदेही पूरी तरह गायब हो जाती है.नियम तभी सार्थक हैं जब उन्हें लागू करने वाले ईमानदार हों।वरना नियम नहीं, सिर्फ बहाने चलते हैं।

 

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