Ajay Kandewar,Wani:- घरकुल लाभार्थियों को सस्ती, करमुक्त और निर्धारित गुणवत्ता की रेत उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शासन द्वारा नीलाम किए गए रेत घाटों में शामिल बेलोरा रेत घाट का हाल ही में भव्य उद्घाटन किया गया। मंच, फीता, भाषण और औपचारिकता पूरी हुई, लेकिन उद्घाटन के बाद अब असली सवाल खड़े हो रहे हैं.क्या वाकई इसका लाभ ज़रूरतमंद घरकुल लाभार्थियों तक पहुँचेगा या फिर हमेशा की तरह यह व्यवस्था भी लूट का शिकार हो जाएगी?
शासन की मंशा स्पष्ट है,घरकुल योजना के लाभार्थियों को तय मात्रा में, तय दर पर और अच्छी गुणवत्ता की रेत मिलनी चाहिए। लेकिन बेलोरा घाट को लेकर ज़मीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। स्थानीय स्तर पर चर्चा तेज़ है कि कहीं घरकुल योजना की आड़ में रेत का खेल दूसरे हितधारकों के हाथों में तो नहीं जा रहा। सबसे बड़ा सवाल यह है कि उद्घाटन के बाद नियमों का सख़्ती से पालन होगा या फिर नियम सिर्फ काग़ज़ों तक ही सीमित रहेंगे?अब जनता यह जानना चाहती है कि क्या प्रशासन यह सुनिश्चित करेगा कि रेत सीधे घरकुल लाभार्थियों के घर तक पहुँचे? या फिर घाट से निकलते ही रेत बीच रास्ते में “गायब” होकर खुले बाज़ार और तस्करों की जेब में चली जाएगी? अगर तय मात्रा से कम रेत मिली, गुणवत्ता में गड़बड़ी हुई या अवैध ढुलाई शुरू हुई, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा—यह सवाल अब और ज़्यादा गंभीर हो गया है।विशेष चिंता इस बात को लेकर है कि उद्घाटन के बाद बेलोरा घाट क्षेत्र में जगह-जगह रेत बिखरी दिखाई देगी और इसका फायदा रेत तस्करों को मिलेगा.
ऐसी आशंका स्थानीय नागरिक खुलकर जता रहे हैं। क्या प्रशासन इस संभावित लूट पर लगाम लगाएगा या फिर बेलोरा घाट तस्करों के लिए “सोने की खान” साबित होगा?अब जनता की निगाहें सीधे क्षेत्र के विधायक संजय देरकर और तहसीलदार पर टिकी हैं। यदि घरकुल लाभार्थियों को तय गुणवत्ता की रेत नहीं मिली, यदि रेत उनके घर तक नहीं पहुँची, या यदि अवैध तस्करी फली-फूली—तो क्या जनप्रतिनिधि और प्रशासन इसकी जवाबदेही स्वीकार करेंगे?

