Ajay Kandewar,Wani:- बेलोरा घाट पर कानून को ताक पर रखकर ऐसी चर्चा जोर पकड रही है की,रात 2 से 5 बजे के बीच पोकलेन मशीनों से खुलेआम अवैध उत्खनन किया जा रहा है और इस पूरे खेल को ‘सचिन’ से जोड़ा जा रहा है। शहर में चर्चा है कि ,जब रात के अंधेरे में पोकलेन जागता है, तब प्रशासन गहरी नींद में होता है। “नो टेंशन” की इस कार्यशैली से शासन को करोड़ों रुपये का नुकसान हो रहा है, लेकिन जिम्मेदारों पर इसका कोई असर दिखाई नहीं देता।
सबसे गंभीर सवाल यह है कि बेलोरा घाट से वणी शहर तक 24 घंटे का परिवहन परमिट आखिर क्यों? GPS जांच और ऑनलाइन परमिट सत्यापन में कोई ठोस जानकारी सामने नहीं आती। नियम कागजों में हैं, लेकिन जमीन पर उनका कोई अस्तित्व नहीं दिखता। चंद्रपुर जिले में जिस ब्रेकडाउन पद्धति को रद्द किया गया, वही पद्धति यवतमाल जिले में अब तक क्यों जारी है—यह सवाल प्रशासन को कठघरे में खड़ा करता है।
वणी शहर में अब यह चर्चा तेज हो गई है कि, उस सचिन से ही “जुड़ा एक भागीदारी व्यवसायिक” ही आगे चलकर “सचिन के लिए घातक” साबित हो सकता है। रेती का भंडारण, पोकलेन मशीनों की वैधता और रात के समय चल रहा उत्खनन—इन सब कड़ियों ने पूरे नेटवर्क को संदेह के घेरे में ला खड़ा किया है। नागरिक पूछ रहे हैं कि, वणी में रेती जमा करने वालों के पास वास्तव में वणी का वैध परमिट है या नहीं, और क्या तहसील प्रशासन इसकी निष्पक्ष जांच करेगा?
जनता यह भी बोल रही है की,यदि बेलोरा घाट की के पास वैध परमिट नहीं है तो उसे तुरंत जमा की हुई रेती जप्त कर लाभार्थियों में वितरित किया जाए। पहले ही दो आवेदन जिल्हा कार्यालय में दर्ज हो चुकी हैं और एक पक्ष ने उपोषण का रास्ता अपना लिया है। बेलोरा घाट को लेकर आंदोलन उग्र होता जा रहा है और शहर में एक ही सवाल गूंज रहा है“प्रशासन दिन में क्यों सोता है और रात में किसके लिए जागता है?” अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मामला और भी विस्फोटक रूप लेने की चेतावनी दे रहा है।


