Ajay,Wani : तहसील के लालपुरिया क्षेत्र में अवैध कोयला प्लॉटों से होने वाले वायु प्रदूषण, पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन और नागरिकों के स्वास्थ्य का मुद्दा गरमाने के बाद जिलाधिकारी ने कोयला प्लॉट बंद करने के आदेश दिए थे। इस मुद्दे पर जोरदार आंदोलन भी किया। लेकिन वर्तमान स्थिति को देखते हुए ऐसा प्रतीत हो रहा है कि यह संघर्ष अपेक्षित परिणाम हासिल करने में अधूरा रह गया। कार्रवाई के नाम पर केवल आठ से “दस छोटे कोयला प्लॉटों पर ही गाज” गिरने की चर्चा है, जबकि बड़े कारोबारियों के मछलिया के अभी भी प्लॉट चोर बाजार मे फेमस होने के आरोप सामने आ रहे हैं। ऐसे में नागरिकों के बीच सवाल उठ रहा है कि छोटों पर कार्रवाई और बड़ों को खुली छूट, आखिर यह कैसा न्याय है? क्या उन्हे केवल पॉकेट संरक्षण मिला.
चिखलगांव क्षेत्र के कोयला प्लॉटों से होने वाले प्रदूषण का मुद्दा काफी सुर्खियों में रहा। लेकिन स्थानीय को का दावा है कि सभी प्लॉट पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। दूसरी ओर, बायपास क्षेत्र में किराये की जगह पर छोटे-मोटे व्यवसाय करने वालों पर कार्रवाई का असर साफ दिखाई देने की बात कही जा रही है। इस कार्रवाई से रोज कमाकर खाने वाले मजदूरों के रोजगार पर भी असर पड़ा है। दिवाली के त्योहार के दौरान कई श्रमिक परिवारों के सामने आर्थिक संकट खड़ा होने की चिंता व्यक्त की जा रही है। नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा करना प्रशासन की जिम्मेदारी है, लेकिन यदि कार्रवाई में समान मापदंड नहीं अपनाए जा रहे हैं, तो प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
बड़े मगरमच्छ अब भी कार्रवाई के दायरे से बाहर? कुछ कोयला प्लॉटों से चोरी-छिपे कोयले की बिक्री जोरो से जारी होने के आरोप भी स्थानीय स्तर पर लगाए जा रहे हैं। यदि ऐसा है, तो जिला प्रशासन, प्रदूषण नियंत्रण मंडल और संबंधित विभागों की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। आखिर कार्रवाई किन प्लॉटों पर, किन नियमों के तहत और किस आधार पर शुरू की गई? प्रशासन को इसका स्पष्ट जवाब देना चाहिए। सभी संबंधित कोयला प्लॉटों की निष्पक्ष जांच कर नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ समान कार्रवाई की जानी चाहिए। केवल बायपास के छोटी मछलियो के प्लॉट बंद करके बाकी को खुली छूट दी जा रही है, तो इससे प्रशासन की निष्पक्षता पर सवाल उठेंगे। या दोन्ही तीन महिने या चार महिने तक वही पर काम की जाणे की परमिशन दी जाये अन्यथा दुसरी जगह होने तक होणे स्थित जगह पर रखा जाये.
इस पूरे मामले में कहीं किसी को राजनीतिक या आर्थिक संरक्षण तो नहीं मिल रहा, क्या कार्रवाई में भेदभाव किया जा रहा है और क्या नियमों का उल्लंघन करने वाले कारोबारियों की अनदेखी हो रही है.इन तमाम सवालों की स्वतंत्र जांच आवश्यक है। हालांकि, किसी व्यक्ति पर आर्थिक लेन-देन या मिलीभगत का आरोप बिना प्रमाण के तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।नागरिकों को प्रदूषणमुक्त हवा चाहिए, चुनिंदा कार्रवाई नहीं! प्रशासन को केवल आदेश जारी करके नहीं रुकना चाहिए, बल्कि उसकी जमीनी स्तर पर प्रभावी अमल सुनिश्चित करना चाहिए। लालपुलीया और चिखलगांव क्षेत्र के सभी संबंधित कोयला प्लॉटों की स्थिति सार्वजनिक की जाए तथा नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ बिना किसी भेदभाव के कठोर कार्रवाई की जाए अन्यथा सभी को 4 महिने का समय दिया जाय.अब नागरिकों की निगाहें प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हैं।

