Ajay Kandewar, Wani: यवतमाल के वणी तालुका स्थित बेलोरा घाट एक बार फिर सुर्खियों में है। नई रेत निर्गमन नीति के तहत विधिवत लिलाव प्रक्रिया के बाद ठेकेदारों को घाट सौंपा गया था। करारनामे में स्पष्ट शर्तें तय की गई थीं.कितनी ब्रास रेत का उत्खनन होगा, किस प्रकार के उपकरणों का उपयोग होगा और पर्यावरणीय नियमों का पालन कैसे किया जाएगा। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।
सूत्रों के अनुसार बेलोरा घाट पर भारी पोकलेन मशीनों का खुलेआम इस्तेमाल किया जा रहा है। नदीपात्र से बड़े पैमाने पर उत्खनन होने की चर्चा है, जिससे जैवविविधता और पर्यावरण पर गंभीर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। स्थानीय स्तर पर यह सवाल उठ रहा है कि जब नियम स्पष्ट हैं, तो आखिर प्रशासन की आंखें क्यों बंद हैं?सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि इस पूरे मामले में एक प्रभावशाली स्थानीय बड़े नेता का दबाव राजस्व प्रशासन पर बना हुआ है। बताया जा रहा है कि उक्त नेता के संरक्षण में ठेकेदार बेखौफ होकर नियमों को दरकिनार कर रहे हैं। इसी कारण कार्रवाई टलती जा रही है। राजस्व विभाग की चुप्पी को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं गर्म हैं।
वणी तहसील कार्यालय पर भी सवाल उठ रहे हैं। चर्चा यह भी है कि “सब कुछ जानते हुए भी” कार्रवाई न होना कई संदेहों को जन्म दे रहा है। स्थानीय नागरिकों के बीच यह धारणा बन रही है कि जब तक बड़े राजनीतिक दबाव का साया रहेगा, तब तक बेलोरा घाट पर नियमों की धज्जियां उड़ती रहेंगी।अब बड़ा सवाल यह है कि, क्या प्रशासन इस कथित दबाव से मुक्त होकर निष्पक्ष कार्रवाई करेगा? या फिर बेलोरा घाट यूं ही राजनीतिक संरक्षण में नियमों की अनदेखी का प्रतीक बना रहेगा?फिलहाल पूरे मामले पर सबकी नजरें प्रशासन की अगली कदम पर टिकी हैं।

